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मीर तक़ी मीर: बे यार शहर दिल का वीरान हो रहा है, दिखलाई दे जहां तक मैदान हो रहा है 

mir taqi mir on alone people
                
                                                         
                            बे यार शहर दिल का वीरान हो रहा है 
                                                                 
                            
दिखलाई दे जहां तक मैदान हो रहा है 

इस मंज़िल-ए-जहां के बाशिंदे रफ़तनी[1] हैं 
हर इक के हां सफ़र का सामान हो रहा है 

अच्छा लगा है शायद आंखों में यार अपनी 
आईना देख कर कुछ हैरान हो रहा है 

गुल देख कर चमन में तुझ को खिला ही जा है 
यानी हज़ार जी से क़ुर्बान हो रहा है 

हाल-ए-ज़बून[2] अपना पोशीदा[3] कुछ न था तो 
सुनता न था कि ये सैद[4] बे-जान हो रहा है 

हर शब[5] गली में उस की रोते तो रहते हो तुम 
इक रोज़ 'मीर' साहब तूफ़ान हो रहा है 

- मीर तक़ी मीर

शब्दार्थ: 1.जाने वाले 2.ख़राब स्थिति 3.छुपा 4.शिकारी 5.रात
8 वर्ष पहले

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