'साकेत महाकवि' मैथिलीशरण गुप्त का लिखा महाकाव्य है जो 12 सर्गों में लिखा गया है। शुरुआती सर्गों में श्रीराम को वनवास का आदेश, अयोध्यावासियों का करुण-रुदन और वनगमन की झांकियां हैं। अंत के सर्गों में लक्ष्मण की पत्नी व राजवधू उर्मिला के वियोग का वर्णन है। साकेत मुख्यत: उर्मिला को केन्द्र में रख कर ही लिखी गयी है। चूंकि लक्ष्मण तो अपने भाई और भाभी के साथ वन को जा चुके हैं लेकिन उर्मिला पीछे भवन में ही रह गयी हैं। उन्हीं की मन:स्थिति का भावपूर्ण वर्णन कवि ने यहां किया है।
मानस-मन्दिर में सती, पति की प्रतिमा थाप,
जलती-सी उस विरह में, बनी आरती आप।
(उर्मिला के ह्रदय में अपने पति की ही प्रतिमा है लेकिन वह विरह से व्याकुल हैं और उसमें किसी आरती की लौ के समान स्वयं जल रही हैं)
आँखों में प्रिय-मूर्ति थी, भूले थे सब भोग,
हुआ योग से भी अधिक उसका विषम-वियोग
(इन वियोग के क्षणों में उर्मिला सब कुछ भूल चुकी थीं। एक राजवधू होने का बाबजूद भी कोई भोग उन्हें अच्छा नहीं लगता था। किसी भी अन्य योग से विषम या कठिन उनका यह विरह-ताप था।)
आठ पहर चौंसठ घड़ी, स्वामी का ही ध्यान
छूट गया पीछे स्वयं, उसका आत्मज्ञान
(किसी भी प्रिया के समान उ्न्हें वियोग में सिर्फ़ अपने स्वामी अर्थात् अपने पति का ही ध्यान था। वह स्वयं के होने के भान को भी भूल चुकी थीं।)
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6 वर्ष पहले
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