आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुमार विश्वास: भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा

kumar vishwas bhramar koi kumudini par machal baitha to hungama
                
                                                         
                            भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
                                                                 
                            

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख़्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूबकर सुनते थे सब क़िस्सा मुहब्बत का
मैं क़िस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हंगामा

कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा
कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा
मैं उससे दूर था तो शोर था साज़िश है, साज़िश है
उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा

जब आता है जीवन में ख़यालातों का हंगामा
ये जज़्बातों, मुलाक़ातों हंसी रातों का हंगामा
जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब
ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा

कलम को ख़ून में ख़ुद के डुबोता हूँ तो हंगामा 
गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा 
नहीं मुझ पर भी जो ख़ुद की ख़बर वो है ज़माने पर 
मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा

इबारत से गुनाहों तक की मंज़िल में है हंगामा
ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा
कभी बचपन, जवानी और बुढ़ापे में है हंगामा
जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा

हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा
जवानी को हमारी कर गया बर्बाद हंगामा
हमारे भाल पर तकदीर ने ये लिख दिया जैसे
हमारे सामने है और हमारे बाद हंगामा 

- कुमार विश्वास 

साभार - कविता कोश
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर