आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कैलाश सत्यार्थी: खून से सनी रोटियों के साथ चिपकी पड़ी हैं जो रेल की पटरियों पर

कैलाश सत्यार्थी
                
                                                         
                            खून से सनी रोटियों के साथ चिपकी पड़ी हैं जो 
                                                                 
                            
रेल की पटरियों पर, वो मेरी उंगलियां हैं 
बड़ी मेहनत से कमाई थी वे रोटियां 
लंबे सफ़र के लिए बचाई थी वे रोटियां 

रोते-रोते मुझे छोड़कर मां भूखी सो पाई होगी?
उसने तो बांधकर रख दी थी घर के पूरे आटे की रोटियां
शहर तक के मेरे लंबे सफ़र के लिए 
नहीं मालूम था कि कुछ रास्ते एकतरफा होते हैं 

मां के आंसुओं से कहीं ज्यादा, बहुत ज्यादा 
तकलीफदेह थी उसकी खांसी और सूखती जाती उसकी काया 
बहुत रुलाता था भूखी गायों का रंभाना 
शेरू की असमय मौत और रोज-रोज साहूकार का गरियाना 
पिता के हाथों खोदे गए मगर अब सूखे पड़े कुंए में 
यूं ही बार-बार झांकना बहुत रुलाता था 

संकट एक कहीं से आया और मुझे एहसास दे गया 
मेरे और शहर के सपने अलग-अलग हैं 
मेरे और उनके अपने भी अलग-अलग हैं 
बहुत हो चुका, लौट पड़ा था उसे पकड़ने छूट गया था जो अपने घर पर
आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर