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राम जी मैं आयी तुमसे एक सवाल पूछने: कर्णिका 

राम जी मैं आयी तुमसे एक सवाल पूछने: कर्णिका
                
                                                         
                            राम जी मैं आयी तुमसे एक सवाल पूछने
                                                                 
                            
एक पहेली थी जिसे मैं खुद ही लगी थी भूलने
पर अब हार कर श्री राम तुम्हारे पास आयी हूं
कुछ सवालों का एक पिटारा साथ अपने लाई हूं
उस पिटारे को खोल के एक-एक सवाल लाऊंगी
और किस असमंजस में उलझी हूं
यह आज तुम्हें बताऊंगी

प्राणों से ऊपर वचनों को कैकई को यूं सौंप दिया
14 वर्षों का वनवास तुम्हारे ऊपर थोप दिया
दशरथ के कहने पर तुमने कैसे नीरव स्वीकार किया?
और सौतेली मां को अपनी से ज्यादा कैसे प्यार किया?
क्यूंकि इस युग में मैंने ना देखा कोई बचा सरवन कुमार
छोटी-छोटी बातों में उन्हें सुना देते हैं बातें हजार
कइयों की तो फितरत होती इतनी बेगानी है
उनके लिए भूखी मां और जागती रातें सब अनजानी हैं
हमने वृद्ध आश्रम भी हमने तो शहर में बनवाए हैं,
श्री राम क्या आप उनसे मिलने कभी वहां आए हैं?

दूसरा सवाल

जलन तो हुई होगी ना जब भरत को साम्राज्य दिया
इस बात को मुस्कुरा के कैसे अपना लिया?
ये बात मुझे बतला दो तुम
ये बात समझ ना आती है
इस युग में तो छोटी बातों पर बात बिगड़ती जाती है
यहां भाई ही भाई को मिट्टी में रौंध गिराता है
और उसी मिट्टी के टुकड़े के लिए उसे ज़हर भी खिलाता है
फिर कैसे छोड़ी तुमने शोहरत, वो गद्दी, मुकुट और हार अपना
जो किसी-किसी की किस्मत में होता
और कितनों का तो बस एक सपना
क्यूंकि इस युग में मैंने पैसों पर
सगों को लड़ते देखा है
अपनों को मरते देखा है
ज्यादा नहीं तो शोहरत वाले भाई को दूसरे को बेइज्जत करते देखा
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7 वर्ष पहले

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