राम जी मैं आयी तुमसे एक सवाल पूछने
एक पहेली थी जिसे मैं खुद ही लगी थी भूलने
पर अब हार कर श्री राम तुम्हारे पास आयी हूं
कुछ सवालों का एक पिटारा साथ अपने लाई हूं
उस पिटारे को खोल के एक-एक सवाल लाऊंगी
और किस असमंजस में उलझी हूं
यह आज तुम्हें बताऊंगी
प्राणों से ऊपर वचनों को कैकई को यूं सौंप दिया
14 वर्षों का वनवास तुम्हारे ऊपर थोप दिया
दशरथ के कहने पर तुमने कैसे नीरव स्वीकार किया?
और सौतेली मां को अपनी से ज्यादा कैसे प्यार किया?
क्यूंकि इस युग में मैंने ना देखा कोई बचा सरवन कुमार
छोटी-छोटी बातों में उन्हें सुना देते हैं बातें हजार
कइयों की तो फितरत होती इतनी बेगानी है
उनके लिए भूखी मां और जागती रातें सब अनजानी हैं
हमने वृद्ध आश्रम भी हमने तो शहर में बनवाए हैं,
श्री राम क्या आप उनसे मिलने कभी वहां आए हैं?
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