मैं लिखते-लिखते रोया था
मैं भारी मन से गाता हूं
जो हिम-शिखरों का फूल बनी
मैं उनको फूल चढ़ाता हूं
मैंने उनके सिंहासन के विपरीत लिखा कविता गायीं
पर उनके ना रहने पर आँखें आँसू भर-भर लायीं
रह-रहकर झकझोर रही हैं यादें ख़ूनी आँधी की
जैसे दोबारा से हत्या हो गयी महात्मा गाँधी की
वो पर्वत राजा की बेटी ऊंची, हो गयी हिमालय से
जिसने भारत ऊँचा माना सब धर्मों के देवालय से
भूगोल बदलने वाली वो इतिहास बदलकर चली गयी
जिससे हर दुश्मन हार गया अपनों के हाथों छली गयी
शातिर देशों की माटी ने ये ओछी मक्कारी की है
पर घर के ही जयचंदों ने भारत से गद्दारी की है
बी.बी.सी. से धमकी देना कायरता है, गद्दारी है
हम और किसी को क्या रोयें गोली अपनों ने मारी है
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