मैं लिखते-लिखते रोया था
मैं भारी मन से गाता हूं
जो हिम-शिखरों का फूल बनी
मैं उनको फूल चढ़ाता हूं
मैंने उनके सिंहासन के विपरीत लिखा कविता गायीं
पर उनके ना रहने पर आँखें आँसू भर-भर लायीं
रह-रहकर झकझोर रही हैं यादें ख़ूनी आँधी की
जैसे दोबारा से हत्या हो गयी महात्मा गाँधी की
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