-मिर्ज़ा ग़ालिब-
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूं, जो चश्मे-तर[1] से उम्र यूं दम-ब-दम[2] निकले
निकलना ख़ुल्द[3] से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बे आबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत[4] की दराज़ी[5] का
अगर उस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म [6] का पेच-ओ-ख़म[7] निकले
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले
मोहब्बत में नही है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
कहां मयख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहां वाइज़[8]
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
1.नम आंखें 2.हर पल, लगातार 3.जन्नत 4.क़द, महानता 5.लंबाई 6.गांठ के साथ पगड़ी में पंख 7.कठिनाई, मुसीबत 8.धर्म-उपदेशक
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