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डॉ. हरिओम पंवार: हां, हुजूर मैं चीख रहा हूं, हां हुजूर मैं चिल्लाता हूं

डाॅ. हरिओम पंवार की कविता
                
                                                         
                            हां, हुजूर मैं चीख रहा हूं, हां हुजूर मैं चिल्लाता हूं
                                                                 
                            
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों की पीड़ा गाता हूं

मेरा कोई गीत नहीं है किसी रूप सी के गालों पर
मैंने छंद लिखे हैं केवल नंगे पैरों के छालों पर
मैंने सदा सुनी है सिसकी मौन चांदनी की रातों में
छप्पर को मरते देखा है रिमझिम-रिमझिम बरसातों में
आहों की अभिव्यक्ति रहा हूं कविता में नारे गाता हूं
मैं सच्चे शब्दों का दर्पण, संसद को भी दिखलाता हूं
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूं। आगे पढ़ें

अवसादों के अभियानों से...

7 वर्ष पहले

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