हां, हुजूर मैं चीख रहा हूं, हां हुजूर मैं चिल्लाता हूं
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों की पीड़ा गाता हूं
मेरा कोई गीत नहीं है किसी रूप सी के गालों पर
मैंने छंद लिखे हैं केवल नंगे पैरों के छालों पर
मैंने सदा सुनी है सिसकी मौन चांदनी की रातों में
छप्पर को मरते देखा है रिमझिम-रिमझिम बरसातों में
आहों की अभिव्यक्ति रहा हूं कविता में नारे गाता हूं
मैं सच्चे शब्दों का दर्पण, संसद को भी दिखलाता हूं
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों कि पीड़ा गाता हूं।
अवसादों के अभियानों से वातावरण पड़ा है घायल
वे लिखते हैं गजरे, कजरे, शबनम, सरगम, मेंहदी, पायल
वे अभिसार पढ़ाने बैठे हैं पीड़ा के सन्यासी को
मैं कैसे साहित्य समझ लूं कुछ शब्दों की अय्याशी को
मैं भाषा में बदतमीज हूं अलंकार को ठुकराता हूं
और गीत के व्याकारणों के आकर्षण से कतराता हूं
क्योंकि हमेशा मैं भूखी अंतड़ियों की पीड़ा गाता हूँ।
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अवसादों के अभियानों से...
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