1- कोशिश
देखता हूँ
अपनी काग़ज़ की
नाव हटा कर
क्या इससे
कुछ कम होता है
जलस्तर...
2- पंचनामा
आग धधक रही थी पहले से
फिर माटी पर
पानी फिरा
पानी पर पवन
टूटा नहीं आसमान...
सरकार का बयान
3- सवाल
कितना कुछ धुला
कितना बह गया
इस बारिश में
मगर कहाँ बहे
जस के तस रहे
औरतों के आँसू
भूखों की लाचारियाँ
आम अवाम की परेशानियाँ...
4- वाकिफ
उसका आना तय था
पर कोई तैयार न था
यह आसपास का
ऐसा खेल था
जिसमें हर कोई पकड़ा गया...
5- समता
भीतर तक हैं तर सब
एक समान हो गए
खड्डे रास्ते नाले
यहाँ से वहाँ तक
भेद कोई नहीं
यह धरती पर
समानता लाने की
कोशिश आसमानी...!
6-रहनुमा
क्या जमीन पर
कोई नहीं ?
आसमान बरस रहा है
और सब
आसमान की ओर ही
देख रहे...
7- दृष्टि
नीचे
प्रलय का
प्रवाह था
कुछ लोग
ऊपर देख रहे थे
इन्द्रधनुष...
8- विडम्बना
डूबी बस
अपनी ही धरती
बाक़ी तो
वैसा ही सूखा
आँखों में वैसी ही रेती
सारा कुछ ज्यों का त्यों परती...
9- प्रतिश्रुति
उधर बून्दें पड़नी
शुरू होतीं
बद-बद
इधर चालू हो जातीं
बूढ़े मन की बुद-बुद...
10- डोलना
जैसे कोई बच्चा किसी बड़े कटोरे को
हिला रहा
कम नहीं हो रहा पानी
खाली इधर से उधर
जा रहा...
11- उतार
आख़िर पानी उतरा
पर कहीं और का कहाँ
घर का
देहरी का
देह का
चेहरें का
आँखों का
रास्ता कोई तो फिर भी नहीं खुला...
12- अपील
इतना पानी
दाह लगा है
उधर नेताजी निवेदन कर रहे
भावनाओं में मत बहिए...
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