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इलाहाबाद पर जय कृष्ण राय तुषार की बेहतरीन कविता...

इलाहाबाद पर जय कृष्ण राय तुषार बेहतरीन कविता...
                
                                                         
                            शरद में 
                                                                 
                            
ठिठुरा हुआ मौसम 
लगा होने गुलाबी 
हो गया 
अपना इलाहाबाद 
पेरिस, अबू धाबी 

देह से 
उतरे गुलाबी -
कत्थई, नीले पुलोवर ,
गुनगुनाने लगे 
घंटों तक 
घरों के बन्द शावर ,
लाँन में 
आराम कुर्सी पर 
हुए ये दिन किताबी 

घोंसलों से  निकल आये 

घोंसलों से 
निकल आये 
पाँव से चलने लगे ,
ये परिन्दे 
झील, खेतों में 
हमें मिलने लगे ,
चुग नहीं 
पाते अभी दानें 
यही इनकी खराबी 

स्वप्न देखें 
फागुनी -
आंखें गुलालों के ,
लौट आये ,
दिन मोहब्बत 
के रिसालों के ,
डाकिये 
फिर खोलकर 
पढ़ने लगे हैं खत जबाबी 
आगे पढ़ें

घोंसलों से  निकल आये 

7 वर्ष पहले

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