आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रामचंद्र शुक्ल की पांच लोकप्रिय ब्रज भाषी कवितायें

best five Braj language poems of Ramchandra Shukla
                
                                                         
                            विनती 
                                                                 
                            

जय जय जग नायक करतार
करत नाथ कर जोरि आज हम विनती बारम्बार
प्रात समीर सरिस भारत महँ हिन्दी करै प्रसार 

जय जय जग नायक करतार
खोलै परखि उनीदे नयनन दरसावैं संसार
बुधा हिय सागर बीच उठावै भाव तरंग अपार 

जय जय जग नायक करतार
देश देश के मृदु सुमनन सों भरि सौरभ को थार
बगरावै यदि भूमि बीच जो हरै समाज विकार 

जय जय जग नायक करतार
मेटे सब असान ताप करि शीतलता संचार
विविध कला किसलय कल रणदरावै प्रतिद्वार 
जय जय..........

मनोहर छटा

नीचे पर्वत थली रम्य रसिकन मन मोहत
ऊपर निर्मल चन्द्र नवल आभायुत सोहत
 
कबहुँ दृष्टि सों दुरत छिपत मेघन के आडें
अन्धकार अधिकार तुरत निज आय पसारे
 
नवल चंद्रिका छिटकि फेरि सब बनहिं प्रकाशत
निर्मल द्युति फैल्या बेगि तमपुंज बिनासत
 
प्रकृति चित्र की छटा होत परिवर्तित ऐसी
चित्रकार की अजब अनोखी गति हैं जैसी

भई प्रकृति हैं मौन पौन हू सोवन लागी
पशु पक्षी हू मनहुँ दियो यहि जग कहं त्यागी
 
केवल कहुँ कहुँ झींगुर अरु झिल्ली झनकारत
जलप्रपात रव मन्द मधुर झरनन कर आवत
 
कतहुं श्याम रंग शिला कहूं थल कहुं हरियाली
बहत मंद परवाह युक्त झरना छबिशाली
 
कहुँ विकराल विशाल शिला आड़त तेहि वेगहिं
उमगि उच्छलित होय तऊ धावत गहि टेकहिं
 
जाय मिलत निज प्रिय सरिता सों कोटि यतन करि
प्रेमिन के पथरोधन को दरसावत दुस्तर
 
राजत कतहूँ झाड़िन की अवली तट ऊपर
कतहुँ खडे दो चार जंगली वृक्ष मनोहर
 
तिन सब कर प्रतिबिंब भांति जल माँहि लखाई
देखन हित निज रूप प्रकृति दर्पन ढिग आई
 
तरु मंडप के रंध्रन बिच सों छनि छनि आवत
शशि किरनन को पुंज सरस शोभा सर सावत
 
करत अलौकिक नृत्य आय निर्मल जल माहीं
निरखि ताहि मन मुग्ध होय थिर रहत तहाँ हीं
 
पहुंच दृष्टि की जात जहां तक दीसत याही
शैल नदी तरु भूमि अटपटी और कछु नाहीं
 
निरखि लेहु एक बेर चहूं दिशि नैन पसारी
मन महँ अंकित करहु माधुरी छवि अति प्यारी

इतहीं चिंता तजत आय जग के नर नारी
इतहीं अनुभव करत सुख सब दु:ख बिसारी
 
इतही प्रेम पियास बुझत प्रेमी गण की अति
आय मिलत जब प्रेम प्रेयसी मंद मधुर गति

आशा और उद्योग

हा! हा! मुझसे कहो न क्यों तुम आशा कभी न होगी पूर्ण
प्रतिफल इसका नहीं मिलेगा बैरी मान न होता चूर्ण 

वृथा मुझे भय मत दिखलाओ आशा से मत करो निराश
कुछ भी बल हैं युगल भुजों में तो बैरी होवेगा नाश 

कर्मों के फल के मिलने में यद्यपि हो जाती हैं देर
तो भी उस जगदीश्वर के घर होता नहीं कभी अंधेर 

करने दो प्रयत्न बस मुझको देने दो जीवन का दान
निजर् कर्त्तव्य पूर्ण कर लूं मैं फल का मुझे नहीं कुछ ध्यान 

यद्यपि मैं दुर्बल शरीर हूं जीवन भी मेरा नि:सार
प्राणदान देने का तो भी मुझको हैं अवश्य अधिकार 

जब तक मेरे इस शरीर में कुछ भी शेष रहेंगे प्राण
तब तक कर प्रयत्न मिटाउगां अत्याचारी का अभिमान 

धर्म न्याय का पक्ष ग्रहण कर कभी न दूंगा पीछे पैर
वीर जनों की रीति यही हैं नहीं प्रतिज्ञा लेते फेर 

देश दु:ख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूंगा
अन्यायी के घोर पाप का दण्ड उसे अवश्य दूंगा 

यद्यपि मैं हूं एक अकेला, बैरी की सेना भारी
पर उद्योग नहीं छोडूंग़ा जगदीश्वर हैं सहकारी 

आशा आशा मुझको केवल तेरा रहा सहारा आज
बल प्रदान तू मुझको करना रख लेना अब मेरी लाज 
 
वसंत 

कुसुमित लतिका ललित तरुन बसि क्यों छबि छावत
हे रसालग्न! बैरि व्यर्थ क्यों सोग बढ़ावत
हे कोकिल! तजि भूमि नाहिं क्यों अनत सिधारी
कोमल कूक सुनाव बैठि अजहूं तरु डारी
 
मथुरा, दिल्ली अरु कनौज के विस्तृत खंडहर
करत प्रति-ध्वनि आज दिवसहू निज कंपित स्वर
जहँ गोरी, महमूद केर पद चिद्द धूरि पर
दिखरावत, भरि नैन नीर, इतिहास-विज्ञ नर
 
और विगत अभिलाष सकल, केवल इक कारन
जन्म-भूमि अनुराग बांधि राख्यो तोहि डारन
तुव पूर्वज यहि ठौर बैठि रव मधुर सुनावत
पूर्व पुरुष सुनि जाहि हमारे अति सुख पावत
 
तिनकी हम संतानपाछिलो नात विचारी
कोकिल, दुख-सहचरी बनी तू रही हमारी
हे हे अरुण पलाश! छटा बन काहि दिखावत
कोउ दृग नहिं अन्वेष मान अब तुम दिसि धावत
 
करि सिर उच्च कदंब रह्यो तू व्यर्थ निहारी
नहीं गोपिका कृष्ण कहीं तुव छाँह बिहारी
रे रे निलज सरोज!अजहुँ निकसत लखि भानहिं
देश-दुर्दशा-जनित दु:ख चित नेकु न आनहिं
 
ये हो मधुकर वृंद! मोहि नहिं कछु आवत कहि
कौन मधुरता लोभ रह्यो बसि दीन देश यहि
चपल-चमेली अंग स्वेत-अभरन क्यों, धरो
मुग्ध होन की क्रिया भूलिगो चित्ता हमारो
 
दीन कलिन सों हे समीर! बरबस क्यों छीनत
मधुर महक, हित नाक हीन हम हतभागी नत
एक एक चलि देहु नाहिं क्यों यह भुव तजि के
हम हत भागे लोग योग नहिं तुव संगति के
 
विगत-दिवस-प्रतिबिंब हाय सम्मुख तुम लावत
भारत-संतति केर विरह चौगुनो बढ़ावत
अहो विधाता वाम दया इतनी चित लावहु
देश काल ते ऋतु वसंत को नाम मिटावहु
 
नहिं यह सब दरकार हमें चहिए केवल अब
उदर भरन हित अन्न और किन हरन होहि सब
नहिं कछु चिंता हमें चिद्द-गौरव रखिबे की
नहीं कामना हमें आपनो यह कहिबे की

गोस्वामीजी और हिन्दू जाति

बल-वैभव-विक्रम-विहीन यह जाति हुई जब सारी
जीवनरुचि घट चली हट चली जग से दृष्टि हमारी
प्रभु की ओर देखने जब हम लगे हृदय में हारे
नए पंथ कुछ चले चिढ़ाने वह तो जग से न्यारे

उस नैराश्यगिरा से आहत मन गिर गया हमारा
अंधकारमय लगा जगत यह रहा न कहीं सहारा
अटपट बानी ने जीवन की खटखट से खटकाया
लोकधर्म के रुचिर रूप पर चटचट पट फैलाया
जिसके तानों में फंसकर मति गति थक चली हमारी
मर्यादा मिट चली लोक की गई वृत्ति वह मारी
होता अभ्युदय जाति का फिर फिर जिसके द्वारा
हरती हैं जो सकल हीनता भरती हैं सुख सारा

जाय वीरता, मान न उसका यदि मानस से जावे
जाय शक्ति पर भक्ति शक्ति की यदि जनमन न भगावे
पर न भारती-पाद-पद्म तज पूज्य बुध्दि यदि भागे
कितनी ही पर ताप तप्त तनु पिसकर पीड़ा पावै
पर यदि दुष्टदमन पर श्रद्धा मन में कुछ रह जावै
लोकरक्षिणी शक्ति उदय तो अपना आप करेगी
विद्या, बल, वैभव वितरित कर सब संताप हरेगी

पर जनता के मन से ये शुभ भाव भगाने वाले
दिन दिन नए निकलते आते थे मत के मतवाले
इतने में सुन पड़ी अतुल सी तुलसी की बर वानी
जिसने भगवत्कला लोक के भीतर की पहचानी
शोभा-शक्ति शील-मय प्रभु का रूप मनोहर प्यारा
दिखा लोकजीवन के भीतर जिसने दिया सहारा
शक्तिबीज शुभ भव्य भक्ति वह पाकर मंगलकारी
मिटी खिन्नता, जीने की रुचि फिर कुछ जगी हमारी

जिस दंडकवन में प्रभु की कोदंड-चंड-ध्वनि भारी
सुनकर कभी हुए थे कंपित निशिचर अत्याचारी
वहीं शक्ति वह झलक उठी झंकार सहित भयहारी
दहल उठा अन्याय उठी फिर मरती जाति हमारी
प्रभु की लोकरंजिनी छवि पर जब तक भक्ति रहेगी
तब तक गिर गिरकर उठने की हम में शक्ति रहेगी
रंजन करना साधुजनों का दुष्टों को दहलाना
दोनों रूप लोकरक्षा के हैं यह भूल न जाना

उभय रूप में देते हैं जिसमें भगवान दिखाई
वह प्राचीन भक्ति तुलसी से फिर से हमने पाई
यही भक्ति हैं जगत् बीच जीना बतलानेवाली
किसी जाति के जीवन की जो करती हैं रखवाली
खींच वीरता, विद्या, बल पर से जो भक्ति हमारी
अपनी ओर फेर करते हों लोकधर्म से न्यारी
हमें चाहिए उनसे अपना पीछा आप छुड़ावें
तुलसी का कर ध्यान न उनकी बातों में हम आवें

(साभार- कविता कोश)
9 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर