दुइ टूक बात
चहयि होटल मा जलपानु करउ की
अॅचारू विचारू की पोथी पढ़उ
व्यभिचारी रहउ सदाचारी बनउ चहयि
सांच्यन ग्वाड़न मूड़ चढ़उ
चाहे राजा भलयि रय्यति हे चहयि
जायि जहाजन म्याड़ चढ़उ
मुलउ द्यास जवार की बातन मा
घर ते तुम दादा न पाछे कढ़उ
तुम हॉथन ग्वाड़न ते मजबूत यी
चारि पनेथी कि बासी करउ
को सगा हयि सही सउत्यालि हयि
तो तनि भाई भले पहिंचानउ तउ
किहि की अमरउती रही जग मा चहयि
आजु जरउ चहयि काल्हि मरउ
कटि जाउ न द्यास की बातन मा तउ
अकारथ का युहु जामा धरउ
कयिसी चकल्लस आई
अब च्यातउ कढ़िले काका बिथरे कर पुरला झारउ
जंगल की डुंड़ी-डंगरी बाड़ी तक पूँछ उठायिनि
अंउंघानी आंखी ख्वालउ
अब बड़ी चकल्लस आई
द्याखउ तउ तनुकु उकसि कयि, दुनिया कस पल्टा खायिस
उयि लाटि कमहटर बच्चा खरगू ते खीस निप्वारयिं
जब हमका बेदु पढ़ावहिं
तब बड़ी चकल्लस आई
बड़कये काँग्रेस वाले पहिंदे गज्जी के ज्वाड़ा
तुम अपना का पहिंचान्यउ तबहे तुमका पहिंचानिनि
यहि पर कुछु स्वाचउ समुझउ
तउ बड़ी चकल्लस आई
द्यााखउ तउ को-को आवयि, यी खगई के ख्यातन मा
चकिया म्यलवारि न होई जो देयि किसनऊ झांसा
तुम चितवउ चारिउ कयिती
तउ बड़ी चकल्लस आई
सब अपने-अपने मन मा हयिं बइठ बसंतु बनाए
स्यावा का सोंगु सजाये पउढ़े घर पर तनियाए
तुम सबकी कलई ख्वालउ
हो, बड़ी चकल्लस आई
तुमरे टुकरन के ऊपर सब व्वार मचा लतिहाउजु
मुलु कोई कबहूं जानिसि यह किहिकी कयिसि तपस्या
सब हयि पढ़ीस के बच्चा
बस बड़ी चकल्लस आई
कठपुतरी
ठुनुकि-ठुनुकि ठिठुकी कठपुतरी
रंगे काठ के जामा भीतर
अनफुरू पिंजरा पंछी ब्वाला,
नाचि-नाचि अंगुरिन पर थकि-थकि
ठाढ़ि ठगी असि जसि कठपुतरी
छिनु बोली, छिनु रोयी गायी,
धायी धक्कन उछरि-पछरि फिरि
उयि ठलुआ की ठलुहायिन ते
परी ‘चकल्लस’ मा कठपुतरी
कयिस-कयिस कनवजिया हउ
घर मा, बँभनन माँ, हिन्दुन मा हिन्दुस्तानिन, संसार बीच
मरजाद का झंडा गाड़ि दिह्यउ अब कयिस-कयिस कनवजिया हउ
तुम बड़े पवित्र, पूर पण्डित नस-नस मा दउरा असिल खून,
तुम खटकुल की खीसयि द्याखउ तुम अयिस बड़े कनवजिया हउ
बहिनी, बिटिया कंगाल जाति की तुमरे कारन पिसी जायि,
तुम सह्यब बने सभा मा भूल्यउ कयिस अयिस कनवजिया हउ
पढ़ि-पढ़ि पूरे पथरा भे हउ घर-घर मा जगुआ छायि रहा
यी सयिति दिल्ली ते घाखति हयि अयस बड़े कनवजिया हउ
ध्वड़हा, उंटहा लदुआ किसान निज करमु करयि तउ तुम डहुंकउ
अपनी बिरादरी का तूरति हउ अयिस नीक कनवजिया हउ
तुम दकियानूसी बतन भूल देस-काल ते पाछे हउ
तुम का गल्लिन का गिटई हंसती, अयिस खरे कनवजिया हउ
तुम जस-जस चउका पर झगरय्उ तस जाति बीच भमोलु भवा
दादा अब हे कुछु चेति जाउ तुम कयिस कनवजिया हउ
अभिलाष
काकनि जो हम हूं पढ़ि पाइति
जण्टर मैन बनित छिनहे मा
पहिनिति उजल कोटु पैजामा
लरिकन की महतारी ऊपर
कसि के हुकुम चलाइति
ठाठ गांठि कै सहरै जाइति
बात - बात पर बात बनाइति
मुंसिफ साहब के दमाद ते
अबे तबे बतलाइति
जानि बूझि अगुंठा धरवाइति
लाला ते लम्बर जिखवाइति
ठकुरन ते बड़कये खेत की
बड़ी रसीद लिखाइति
यहु फुटही तकदीर क नकसा
खोलिति अपनै अलग मदरसा
दुनिया वाले पढ़े लिख्यन का
टिल्लइ टिल्ल उड़ाइति
(साभार- कविता कोश)
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