आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई: बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई: बशीर बद्र।
                
                                                         
                            कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई 
                                                                 
                            
मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई 

मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में 
मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई 

भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले 
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिजक गई 

तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है 
मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई 

तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं 
तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई 
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर