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बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल : बयाने-ग़म

bahadur shah zafar
                
                                                         
                            गयी यक ब यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार
                                                                 
                            
करूं इस सितम का मैं क्या बयां, मिरा ग़म से सीना फिग़ार है

यह रिआया-ए-हिन्द तबाह हुई कहो क्या-क्या इन पे जफ़ा हुई
जिसे देखा हाकिमे-वक्त ने, कहा यह भी क़ाबिले-दार है
 

यह किसी ने ज़ुल्म भी है सुना कि दी फांसी लोगों को बेगुनह
वले कल्मागोइयों [1] की सिम्त से अभी उनके दिल में ग़ुब है
 
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5 वर्ष पहले

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