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कश्मीर पर अटल जी की वह कविता जो भुलाए नहीं भूलती

कश्मीर पर अटल जी की वह कविता जो भुलाए नहीं भूलती
                
                                                         
                            एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्रता भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।
                                                                 
                            

अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है। आगे पढ़ें

7 वर्ष पहले

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