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असरारुल हक मजाज की मजबूरियां और पेशे खिदमत है यह नज्म... 

मजाज लखनवी
                
                                                         
                            असरारुल हक मजाज उर्दू के प्रमुख प्रगतिशील शायर है। उनका नाम फैज अहमद फैज जैसे बड़े शायर के साथ जोड़ा जाता है। मजाज ने भी दूसरे प्रगतिशील शायरों की तरह गजलों की अपेक्षा नज्में अधिक लिखी हैं। मजाज की रूमानी शायरी में जब इंकलाबियत ने प्रवेश किया तो उनकी शायरी और भी आकर्षण का केंद्र बन गयी। ऐसी ही  उनकी एक नज्म 'मजबूरियां' यहां दिल के जज्बात बयां कर रही है। 
                                                                 
                            

मैं आहें भर नहीं सकता, कि नग्में गा नहीं सकता 
सुकूं लेकिन मेरे दिल को मयस्सर नहीं आ सकता 

कोई नग्मे तो क्‍या अब मुझ से मेरा साज भी ले ले 
जो गाना चाहता हूं आह वो मैं गा नहीं सकता 

मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता...

मताए-सोजो-साजे-जिंदगी, पैमानओ-बरबत
मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता

वो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकते
मिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकता
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मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता...

8 वर्ष पहले

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