असरारुल हक मजाज उर्दू के प्रमुख प्रगतिशील शायर है। उनका नाम फैज अहमद फैज जैसे बड़े शायर के साथ जोड़ा जाता है। मजाज ने भी दूसरे प्रगतिशील शायरों की तरह गजलों की अपेक्षा नज्में अधिक लिखी हैं। मजाज की रूमानी शायरी में जब इंकलाबियत ने प्रवेश किया तो उनकी शायरी और भी आकर्षण का केंद्र बन गयी। ऐसी ही उनकी एक नज्म 'मजबूरियां' यहां दिल के जज्बात बयां कर रही है।
मैं आहें भर नहीं सकता, कि नग्में गा नहीं सकता
सुकूं लेकिन मेरे दिल को मयस्सर नहीं आ सकता
कोई नग्मे तो क्या अब मुझ से मेरा साज भी ले ले
जो गाना चाहता हूं आह वो मैं गा नहीं सकता
मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता...
मताए-सोजो-साजे-जिंदगी, पैमानओ-बरबत
मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता
वो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकते
मिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकता
न तूफां रोक सकते हैं, न आंधी रोक सकती है...
हवसकारी है जुर्मे-खुदकशी मेरी शरीयत में
ये हद्दे-आखिरी है मैं यहां तक जा नहीं सकता
न तूफां रोक सकते हैं, न आंधी रोक सकती है
मगर फिर भी मैं उस कस्त्रे-हसीं तक जा नहीं सकता
कि उसके गीत भी जी खोल कर मैं गा नहीं सकता...
वो मुझको चाहती है, और मुझ तक आ नहीं सकती
मैं उसको पूजता हूं, और उसको पा नहीं सकता
ये मजबूरी सी मजबूरी, ये लाचारी सी लाचारी
कि उसके गीत भी जी खोल कर मैं गा नहीं सकता
यहां वो आ नहीं सकती, वहां मैं जा नहीं सकता...
जबां पर बेखुदी में नाम उसका आ ही जाता है
अगर पूछे कोई ये कौन है, बतला नहीं सकता
कहां तक किस्सए-आलामे-फुरकत ये है
यहां वो आ नहीं सकती, वहां मैं जा नहीं सकता
हदें वो खींच रक्खी हैं, हरम के पासबानों ने
कि बिन मुजरिम बने, पैगाम भी पहुंचा नहीं सकता
साभार- असरारुल हक मजाज की शायरी
अंधेरी रात का मुसाफिर
संपादन-शहरयार व महताब हैदर नकवी
वाणी प्रकाशन
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मैं खुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता...
8 वर्ष पहले
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