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आजाद बला की रचनाकार अमृता प्रीतम की 2 चुनिंदा कविताएं

अमृता प्रीतम
                
                                                         
                            मैंने पल भर के लिए --आसमान को मिलना था 
                                                                 
                            
पर घबराई हुई खड़ी थी ....
कि बादलों की भीड़ से कैसे गुजरूंगी ..

कई बादल स्याह काले थे 
खुदा जाने -कब के और किन संस्कारों के 
कई बादल गरजते दिखते
जैसे वे नसीब होते हैं राहगीरों के 

कई बादल शुकते ,चक्कर खाते 
खंडहरों के खोल से उठते ,खतरे जैसे 
कई बादल उठते और गिरते थे 
कुछ पूर्वजों कि फटी पत्रियों जैसे 

कई बादल घिरते और घूरते दिखते 
कि सारा आसमान उनकी मुट्ठी में हो 
और जो कोई भी इस राह पर आये 
वह जर खरीद गुलाम की तरह आये ..

मैं नहीं जानती कि क्या और किसे कहूँ 
कि काया के अन्दर --एक आसमान होता है 
और उसकी मोहब्बत का तकाजा ..
वह कायनाती आसमान का दीदार मांगता है 

पर बादलों की भीड़ का यह जो भी फ़िक्र था 
यह फ़िक्र उसका नहीं --मेरा था 
उसने तो इश्क की कानी खा ली थी 
और एक दरवेश की मानिंद उसने 
मेरे श्वांसों कि धूनी रमा ली थी 
मैंने उसके पास बैठ कर धूनी की आग छेड़ी 
कहा-ये तेरी और मेरी बातें...
पर यह बातें--बादलों का हुजूम सुनेगा 
तब बता योगी ! मेरा क्या बनेगा ?
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6 वर्ष पहले

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