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हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है 

अकबर इलाहाबादी
                
                                                         
                            -अकबर इलाहाबादी-
                                                                 
                            

हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है 
डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है 

ना तजरबा कारी से वाइज़ की ये हैं बातें 
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है 

उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना 
मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है 

ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा 
मेहमान-ए-नज़र इस दम एक बर्क़-ए-तजल्ली[2] है 

वां दिल में कि सदमे दो यां जी में कि सब सह लो 
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है 

तालीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना 
बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है 

सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़[3] लाज़िम 
हां तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है 

1.उपदेशक,प्रवचनकर्ता,धर्म-उपदेशक 2.बिजली की चमक 3.सच्चाई का अनुपालन
9 वर्ष पहले

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