काका हाथरसी का असली नाम प्रभु लाल गर्ग था। लेकिन वह काका कैसे बन गए इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। दरअसल प्रभु दयाल 'काका' के नाम से नाटक किया करते थे, इससे उन्हें ख़ासी प्रसिद्धि भी मिली। इसके बाद उन्होंने काका का नाम अपने लेखन में भी जोड़ लिया और हाथरस का होने की वजह से वह हाथरसी हुए। काका को संगीत का भी ज्ञान था, उन्होंने संगीत कार्यालय की भी स्थापना की थी जो क्लासिकल संगीत की मैगेज़िन छापा करती थी। काका हाथरसी कवि सम्मेलनों के एक चर्चित नाम थे और दूर-दूर से लोग उनकी कविताएं सुनने आया करते थे। भारत सरकार ने 1985 में काका जी को पद्मश्री से सम्मानित भी किया था।
काका की लिखी चुनिंदा कविताएं
मन मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूठों के घर पंडित बांचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की!
प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करें किलोल
टेप-रिकाॅर्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रहीं, जन-जन के कल्याण की
जय बोल बेईमान की
महंगाई ने कर दिए, राशन-कारड फेल
पंख लगाकर उड़ गए, चीनी-मिट्टी तेल।
‘क्यू’ में धक्का मार किवाड़ें बंद हुई दूकान की
जय बोल बेईमान की!
डाक-तार संचार का ‘प्रगति’ कर रहा काम
कछुआ की गति चल रहे, लेटर-टेलीग्राम।
धीरे काम करो, तब होगी उन्नति हिंदुस्तान की
जय बोलो बेईमान की!
दिन-दिन बढ़ता जा रहा काले घन का जोर
डार-डार सरकार है, पात-पात करचोर।
नहीं सफल होने दें कोई युक्ति चचा ईमान की
जय बोलो बेईमान की!
चैक केश कर बैंक से, लाया ठेकेदार
आज बनाया पुल नया, कल पड़ गई दरार।
बांकी झांकी कर लो काकी, फाइव ईयर प्लान की
जय बोलो बईमान की!
वेतन लेने को खड़े प्रोफेसर जगदीश
छहसौ पर दस्तखत किए, मिले चार सौ बीस।
मन ही मन कर रहे कल्पना शेष रकम के दान की
जय बोलो बईमान की!
खड़े ट्रेन में चल रहे, कक्का धक्का खायं
दस रुपए की भेंट में, थ्री टायर मिल जायं।
हर स्टेशन पर हो पूजा श्री टी.टी. भगवान की
जय बोलो बईमान की
बेकारी औ’ भुखमरी, महंगाई घनघोर
घिसे-पिटे ये शब्द हैं, बंद कीजिए शोर।
अभी जरूरत है जनता के त्याग और बलिदान की
जय बोलो बईमान की!
मिल-मालिक से मिल गए नेता नमकहलाल
मंत्र पढ़ दिया कान में, खत्म हुई हड़ताल।
पत्र-पुष्प से पाकिट भर दी, श्रमिकों के शैतान की
जय बोलो बईमान की!
न्याय और अन्याय का, नोट करो डिफरेंस,
जिसकी लाठी बलवती, हांक ले गया भैंस।
निर्बल धक्के खाएं, तूती होल रही बलवान की
जय बोलो बईमान की!
पर-उपकारी भावना, पेशकार से सीख
दस रुपए के नोट में बदल गई तारीख।
खाल खिंच रही न्यायालय में, सत्य-धर्म-ईमान की
जय बोलो बईमान की!
नेता जी की कार से, कुचल गया मज़दूर
बीच सड़कर पर मर गया, हुई गरीबी दूर।
गाड़ी को ले गए भगाकर, जय हो कृपानिधान की
जय बोलो बईमान की!
आए जब दल बदल कर नेता नन्दूलाल
पत्रकार करने लगे, ऊल-जलूल सवाल
ऊल-जलूल सवाल, आपने की दल-बदली
राजनीति क्या नहीं हो रही इससे गँदली
नेता बोले व्यर्थ समय मत नष्ट कीजिए
जो बयान हम दें, ज्यों-का-त्यों छाप दीजिए
समझे नेता-नीति को, मिला न ऐसा पात्र
मुझे जानने के लिए, पढ़िए दर्शन-शास्त्र
पढ़िए दर्शन-शास्त्र, चराचर जितने प्राणी
उनमें मैं हूँ, वे मुझमें, ज्ञानी-अज्ञानी
मैं मशीन में, मैं श्रमिकों में, मैं मिल-मालिक
मैं ही संसद, मैं ही मंत्री, मैं ही माइक
हरे रंग के लैंस का चश्मा लिया चढ़ाय
सूखा और अकाल में 'हरी-क्रांति' हो जाय
'हरी-क्रांति' हो जाय, भावना होगी जैसी
उस प्राणी को प्रभु मूरत दीखेगी वैसी
भेद-भाव के हमें नहीं भावें हथकंडे
अपने लिए समान सभी धर्मों के झंडे
सत्य और सिद्धांत में, क्या रक्खा है तात ?
उधर लुढ़क जाओ जिधर, देखो भरी परात
देखो भरी परात, अर्थ में रक्खो निष्ठा
कर्तव्यों से ऊँचे हैं, पद और प्रतिष्ठा
जो दल हुआ पुराना, उसको बदलो साथी
दल की दलदल में, फँसकर मर जाता हाथी
मेरी भाव बाधा हरो, पूज्य बिहारीलाल
दोहा बनकर सामने, दर्शन दो तत्काल।
अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज।
अँखियाँ मादक रस-भरी, गज़ब गुलाबी होंठ,
ऐसी तिय अति प्रिय लगे, ज्यों दावत में सोंठ।
अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,
मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट।
अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,
ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख।
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम,
भाग्यवाद का स्वाद ले, धंधा काम हराम।
एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय,
दूध- दही- फल अन्न-जल, छोड़ पीजिए चाय।
छोड़ पीजिए चाय, अमृत बीसवीं सदी का,
जग-प्रसिद्ध जैसे गंगाजल गंग नदी का।
कहँ 'काका', इन उपदेशों का अर्थ जानिए,
बिना चाय के मानव-जीवन व्यर्थ मानिए।
कविता लिखने के लिए 'मूड' नहीं बन पाए,
एक सांस में पीजिए चार- पांच कप चाय।
चार- पांच कप चाय, अगर रह जाए अधूरी,
इतने ही लो, और हो गई कविता पूरी।
कहं 'काका' कवि, खंडकाव्य को पंद्रह प्याला,
पचपन कप में महाकाव्य हमने लिख डाला।
प्लेटफार्म पर यात्री, पानी को चिल्लाय,
पानी वाला है नहीं, चाय पियो जी चाय।
चाय पियो जी चाय, हिलाकर बोला दाढ़ी,
पैसे लेउ निकाल, छूट जाएगी गाड़ी।
'काका' पीकर चाय विरोधी दल का नेता,
धुआंधार व्याख्यान सभा-संसद में देता।
लक्ष्मण के शक्ति लगी, विकल हुए भगवान,
संजीवनी लेने गए, पवन - पुत्र हनुमान।
पवन - पुत्र हनुमान, आ गए लेकर बूटी,
सेवन करके लखनलाल की निद्रा टूटी।
कहं 'काका' कवि, जब खोली अक्क्ल की खत्ती,
समझ गए हम, इस चाय की थीं कुछ पत्ती।
जब काका हाथरसी से डाकुओं ने कहा, “हमें अपनी हास्य-कविता सुनाइए”
यह किस्सा है प्रसिद्ध हास्य कवि काका हाथरसी और बालकवि बैरागी के बारे में जिसे अमर उजाला काव्य को सुनाया काका हाथरसी के पौत्र अशोक गर्ग ने, पढ़ें वह किस्सा।
काका हाथरसी प्रसिद्धि के शिखर पर थे और मुरैना में डाकुओं का बोलबाला था। मुरैना के एक कवि सम्मेलन में काका हाथरसी और बालकवि बैरागी सम्मिलित होने गए थे। कवि सम्मेलन के ख़त्म होने के बाद वहां कुछ डाकू आए और दोनों का अपहरण कर, आंख पर पट्टी बांध अपने अड्डे पर ले गए। वहां ले जाकर उन्होंने दोनों ही हास्य कवियों से कहां, "आप हमारे साथियों को कविताएं सुनाइए"।
उसके बाद काका हाथरसी और बालकवि बैरागी ने अपनी कविताएं वहां सुनाईं। इसके बाद डाकुओं ने उन्हों 100 रुपए दिए और उन्होंने उसे लेने से मना कर दिया लेकिन डाकुओं के काफ़ी कहने के बाद वह रुपए उन्होंने ले लिए।
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काका की लिखी चुनिंदा कविताएं
4 वर्ष पहले
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