एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय,
दूध- दही- फल अन्न-जल, छोड़ पीजिए चाय।
छोड़ पीजिए चाय, अमृत बीसवीं सदी का,
जग-प्रसिद्ध जैसे गंगाजल गंग नदी का।
कहँ 'काका', इन उपदेशों का अर्थ जानिए,
बिना चाय के मानव-जीवन व्यर्थ मानिए।
कविता लिखने के लिए 'मूड' नहीं बन पाए,
एक सांस में पीजिए चार- पांच कप चाय।
चार- पांच कप चाय, अगर रह जाए अधूरी,
इतने ही लो, और हो गई कविता पूरी।
कहं 'काका' कवि, खंडकाव्य को पंद्रह प्याला,
पचपन कप में महाकाव्य हमने लिख डाला।
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चाय चक्रम
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