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गोपाल दास व्यास: जूतों को ज़रा बचाना तुम !

गोपाल दास व्यास: जूतों को ज़रा बचाना तुम !
                
                                                         
                            जी, कुछ भी बात नहीं थी,
                                                                 
                            
अच्छा-बीछा घर से आया था।
बीवी ने बड़े चाव से मुझको,
बालूजा पहनाया था।

बोली थीं, “देखो, हंसी नहीं,
जब कभी मंच पर जाना तुम।
ये हिन्दी का सम्मेलन है,
जूतों को ज़रा बचाना तुम!”

“क्या मतलब ?” तो हंसकर बोलीं-
“जब से आज़ादी आई है,
'जग्गो के चाचा' तुमने तो,
सारी अकल गंवाई है!

इन सभा और सम्मेलन में
जो बड़े-बड़े जन आते हैं।
तुम नहीं समझना इन्हें बड़े,
उद्देश्य खींचकर लाते हैं।

इनमें आधे तो ऐसे हैं,
जिनको घर में कुछ काम नहीं।
आधे में आधे ऐसे हैं,
जिनको घर में आराम नहीं।
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7 वर्ष पहले

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