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चिराग़ जैन की कविता- दूसरा प्यार 

चिराग़ जैन की कविता- दूसरा प्यार
                
                                                         
                            फिर से मन में अंकुर फूटे, फिर से आँखों में ख्वाब पले
                                                                 
                            
फिर से कुछ अंतस में पिघला, फिर से श्वासों से स्वर निकले
फिर से मैंने सबसे छुपकर, इक मन्नत मांगी ईश्वर से
फिर से इक सादा-सा चेहरा, कुछ ख़ास लगा दुनिया भर से
फिर इक लड़की के इर्द-गिर्द, जीवन के सब प्रतिमान बने
फिर इक चेहरे के हाव-भाव, सुन्दरता के उपमान बने

मुझको लगता था ये सब कुछ शायद इस बार नहीं होगा
पहले के अनुभव कहते थे, अब मुझको प्यार नहीं होगा
फिर से मेरे मोबाइल में इक नम्बर सबसे ख़ास बना
फिर से बदला हर पासवर्ड, इक नाम मेरा विश्वास बना
फिर से इक मद्धम रिंगटोन, आँखों की चमक बढ़ाती थी
फिर से इक लड़की की फोटो, मुझसे घण्टों बतियाती थी
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6 वर्ष पहले

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