आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो, भाग्यवाद पर अड़े हुए हो: काका हाथरसी

काका हाथरसी
                
                                                         
                            प्रकृति बदलती क्षण-क्षण देखो,
                                                                 
                            
बदल रहे अणु, कण-कण देखो
तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो 
भाग्य वाद पर अड़े हुए हो।।

छोड़ो मित्र ! पुरानी डफली,
जीवन में परिवर्तन लाओ 
परंपरा से ऊंचे उठ कर,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ ।। आगे पढ़ें

जब तक घर मे धन संपति हो

8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर