आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ख़स्ता है हाल भइया, झंझट ही झंझट, दैया री दैया

अशोक चक्रधर
                
                                                         
                            रस्ता है मुश्किल 
                                                                 
                            
ख़स्ता है हाल भइया
झंझट ही झंझट, दैया री दैया।

देखा मैंने एक आदमी 
पड़ा सड़क के बीच में 
खाई चोट कराह रहा था 
सना हुआ था कीच में 

जाने क्या झंझट हो भइया 
जाने कैसा लफड़ा हो 
खिसक लिया अनदेखी करके 
बना इस घड़ी नीच मैं 
राम जाने क्या पूछे सिपइया 

रस्ता है मुश्किल 
ख़स्ता है हाल भइया 
झंझट ही झंझट, दैया री दैया आगे पढ़ें

8 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर