पीयूष दईया की कविताएं कुछ तलाशती हुई नए-नए किवाड़ खोलती सी प्रतीत होती हैं। इसके लिए वह कई प्रतीकों और बिंबों का इस्तेमाल करते हुए नए मुहावरे गढ़ते हैं। इन अशीर्षक कविताओं को उन्होंने नौ श्रेणियों में बांधकर प्रस्तुत किया है। हर श्रेणी की कविता के साथ रेखाचित्र का प्रयोग कविताओं को और अधिक सार्थक और बोधगम्य बना देता है। ऐसे प्रयोग बहुधा कम ही देखने को मिलते हैं। आम पाठक के लिहाज से पीयूष दईया की भाषा थोड़ी दुरूह जरूर लगती है, लेकिन उसमें उन्होंने जिस तरह बिंबों को बांधा है, उससे कविताओं की पठनीयता उत्सुकता सी जगाती हुई और आगे की तलाश कराती है। कविताओं की लाइब्रेरी में उनकी एक लाइन की कविता भी बड़ा कैनवास लिए है।
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