हिंदी के चर्चित और महत्वपूर्ण कवि नवल की पंक्तियां हैं- ‘जब लिखने के लिए लिखी जाती है कविता, तो वह कविता नहीं, कविता का स्वांग-भर होती है।’ यह सत्य है कि कविता सायास नहीं लिखी जा सकती, कविता तो उतरती है विचारों के आकाश से मन की धरा पर और लिपट-चिपट जाती है कोरे कागज से, जैसे मिलती है कोई मां अपनी संतान से एक अंतराल के बाद। संभवतः इसीलिए कविता लिखना दिनचर्या के किसी अनिवार्य कार्य से निवृत्त होने का नाम नहीं है।
विशाखा तिवारी की सद्यः प्रकाशित काव्य-कृति ‘हथेलियों में चांदनी’ की 46 कविताओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि ये कविताएं स्फूर्त रूप से सृजित हैं, उत्पादित नहीं हैं। संग्रह की कविताएं जहां एक ओर अलग-अलग सामाजिक विषयों को सशक्त रूप से उठाती हैं, वहीं दूसरी ओर प्रेम की मिठास को अपनी ही तरह से अभिव्यक्त करती हैं। कविताओं में शब्द, अर्थ में घुल जाते हैं और अर्थ, शब्दों की दिव्यदेह धारण कर अनुभूति को चरमोत्कर्ष तक पहुंचाते हैं।
पानी के किसी बुलबुले की पर्त की तरह सुकोमल प्रेम की संवेदना को पराकाष्ठा की सीमा तक महसूस करते हुए संग्रह की पहली ही कविता ‘पहचान’ में वह कहती हैं-‘पहचानती हूं तुम्हें, जैसे गंध से पहचानते हैं फूल को, जैसे कच्चे दूध सेे पहचानते हैं उसके उत्स को, पहचानती हूं तुम्हें, जैसे ध्वनि से पहचानते हैं शब्द को, जैसे बूंदों से वनस्पति की प्रसन्नता’। एक अन्य प्रेम कविता ‘महसूस करती हूं तुम्हें’ में विशाखा प्रेम के पलों की सुगंध को शब्दायित करती हैं। प्रेम के और भी अन्य स्वरूप हैं। प्रेम संगीत है, राग है, लय है, नाद है, निश्छलता है और यह निश्छल प्रेम कई संदर्भों में अति संवेदनशीलता के साथ संग्रह की कविताओं में महत्वपूर्ण रूप से अभिव्यक्त हुआ है।
वर्तमान समय का सबसे बड़ा संकट और सामाजिक विद्रूपता है नारी-उत्पीड़न। विशाखा अपनी कविता ‘पांव-टिक्का’ में संवेदनहीन समाज की क्रूरता से त्रस्त एक बच्ची की पीड़ा को बेहद संवेदनशीलता के साथ उजागर करती हैं- ‘अभी कल खेल रही थी वह बच्ची चौबारे पर पांव-टिक्का... खेलते-खेलते वह कब बड़ी हो गई पता ही नहीं चला उसे। फिर छीन ली किसी ने उसकी फूल-सी हंसी, परियों-सा उड़ने का चाव'। कविताओं में सांगीतिक प्रतीक भी सहज रूप से चहलकदमी करते दिखाई पड़ जाते हैं। सहज-सरल भाषा के शब्दों का प्रयोग उनकी कविताओं को अर्थ और अनुभूति के नए उत्कर्ष प्रदान करता है।
किताब- हथेलियों में चांदनी
लेखिका- विशाखा तिवारी
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य- 120 रुपये
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6 वर्ष पहले
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