लगभग चार दशक पूर्व (1982) प्रकाशित पंकज बिष्ट के उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' का आज के दौर में पुन: पाठ एक विस्मयभरा अनुभव है। कारण यह कि यदि उपन्यास के तात्कालिक साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भों को परे रखकर इसके पात्रों की मध्यवर्गीय परिणतियों का सामाजिक पाठ किया जाए, तो 'दि ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' की पतनगाथा का ऐसा भविष्योन्मुखी प्रामाणिक और दिलचस्प वृत्तांत है, जो उतना ही प्रामाणिक और अद्यतन आज भी है, जितना तब था।
उपन्यासकार यहां त्रासदी के खुशमिजाज वृत्तांतकार के रूप में उपस्थित है। मध्यवर्गीय रूपांतरण की इस पतनगाथा को जिस सांस्कृतिक साहित्यिक परिवेश में रच-बस कर पेश किया गया है, वह इस उपन्यास का अतिरिक्त महत्त्व है।
'लेकिन दरवाजा' की कथाभूमि सातवें दशक से लेकर नवें दशक के आरंभिक एक-दो वर्षों तक का विस्तार लिए हुए है। उपन्यासकार की चाक्षुष भाषा में कहें तो यह उपन्यास तब शुरू होता है, जब नई कविता अस्तमान थी। अकविता ग्रीनविच विलेज से बरास्ता टालीगंज आ रही थी। अगर आप इसे व्यक्तिनिष्ठ ढंग से चाहें तो कह सकते हैं, 'पाउंड-इलियट जा रहे थे, गिन्सबर्ग-मलय आ रहे थे।' भाषा की यह रवानगी और अर्थगाम्भीर्य समूचे उपन्यास में अंतर्धारा के रूप में उपस्थित है।
उपन्यासकार के उपरोक्त रचनात्मक खिलंदड़ेपन से मुक्त होकर यह भी कहा जा सकता है कि 'लेकिन दरवाजा' उस दौर की रचना है, जब समूचे वैश्विक फलक पर वियतनाम युद्ध विरोधी राजनीतिक वायुमंडल था, तो सांस्कृतिक स्तर पर गिन्सबर्ग की बीटनिक पीढ़ी और मार्क्सवाद का दबदबा था
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X