लगभग चार दशक पूर्व (1982) प्रकाशित पंकज बिष्ट के उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' का आज के दौर में पुन: पाठ एक विस्मयभरा अनुभव है। कारण यह कि यदि उपन्यास के तात्कालिक साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भों को परे रखकर इसके पात्रों की मध्यवर्गीय परिणतियों का सामाजिक पाठ किया जाए, तो 'दि ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' की पतनगाथा का ऐसा भविष्योन्मुखी प्रामाणिक और दिलचस्प वृत्तांत है, जो उतना ही प्रामाणिक और अद्यतन आज भी है, जितना तब था।
उपन्यासकार यहां त्रासदी के खुशमिजाज वृत्तांतकार के रूप में उपस्थित है। मध्यवर्गीय रूपांतरण की इस पतनगाथा को जिस सांस्कृतिक साहित्यिक परिवेश में रच-बस कर पेश किया गया है, वह इस उपन्यास का अतिरिक्त महत्त्व है।
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