करीब 47 साल की दुश्मनी, छह हफ्ते का युद्ध और अब आमने-सामने बातचीत दुनिया की नजरें इस वक्त Islamabad पर टिकी हैं, जहां United States और Iran के बीच एक ऐतिहासिक वार्ता होने जा रही है।
यह वही दो देश हैं, जिनके रिश्ते 1979 की Iranian Revolution के बाद से लगातार तनाव और टकराव से भरे रहे हैं। लेकिन अब हाल ही में हुए छह हफ्तों के संघर्ष और उसके बाद घोषित संघर्ष विराम के बीच, दोनों देश कूटनीति के रास्ते पर लौटने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बातचीत की खास बात यह है कि 1979 के बाद पहली बार इतने उच्च स्तर पर दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठ सकते हैं। हालांकि, यह अब भी साफ नहीं है कि यह सीधी बातचीत होगी या फिर ‘शटल डिप्लोमेसी’ के जरिए जहां दोनों पक्ष अलग-अलग कमरों में होंगे और मध्यस्थ देश संदेशों का आदान-प्रदान करेगा।
अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति JD Vance इस वार्ता में हिस्सा लेने इस्लामाबाद पहुंचे हैं। उनके साथ विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और Jared Kushner भी मौजूद हैं। वहीं ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष Mohammad Ghalibaf इस बातचीत का नेतृत्व करेंगे।
इस उच्चस्तरीय बैठक को लेकर पाकिस्तान ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। 10 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है और राजधानी में रेड अलर्ट जारी है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने बातचीत में शामिल प्रतिनिधियों के लिए वीजा ऑन अराइवल की सुविधा भी दी है, जिससे इस वार्ता के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है क्या इस बैठक से कोई ठोस नतीजा निकलेगा? अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसकी संभावना काफी कम है। दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच मूलभूत मतभेद अब भी जस के तस बने हुए हैं।
अमेरिका की प्रमुख मांग है कि ईरान ‘जीरो एनरिचमेंट’ यानी परमाणु संवर्धन पूरी तरह बंद करे। वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार पर सीधा हमला मानता है। यही मुद्दा इस वार्ता की सबसे बड़ी बाधा बन सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती इस्राइल का मुद्दा है। सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपनी तरफ से बातचीत कर रहा है या इस्राइल के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है? क्योंकि अगर कोई समझौता होता भी है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि Israel उसे मान लेगा।
तीसरी और सबसे संवेदनशील चुनौती है Strait of Hormuz। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह इस रणनीतिक जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा। साथ ही उसने चेतावनी दी है कि अगर इस्राइल ने लेबनान में हिज्बुल्लाह पर हमले जारी रखे, तो वह जवाबी कार्रवाई करेगा। इससे संघर्ष विराम पर भी खतरा मंडराने लगा है।
अगर इतिहास पर नजर डालें, तो 1979 से पहले अमेरिका और ईरान के रिश्ते बेहद करीबी थे। लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच संवाद लगभग खत्म हो गया।
हालांकि, कुछ मौके ऐसे भी आए जब रिश्तों में नरमी दिखी। 2013 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Barack Obama और ईरानी राष्ट्रपति Hassan Rouhani के बीच फोन पर बातचीत हुई। इसके बाद 2015 में ऐतिहासिक परमाणु समझौता JCPOA हुआ।
लेकिन 2018 में Donald Trump ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया, जिससे रिश्ते फिर बिगड़ गए।
अब एक बार फिर इतिहास के मोड़ पर खड़े ये दोनों देश इस्लामाबाद में बातचीत की टेबल पर हैं। लेकिन सवाल वही है क्या कूटनीति बंदूक की आवाज को दबा पाएगी?
क्योंकि इस बार दांव सिर्फ दो देशों के रिश्तों का नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक शांति का है।