रंगों से कैनवास पर बनाईं आकृतियां... बारीक रेखाओं से सजे फूल-पत्तियां और पारंपरिक चित्र। कभी यही कला शिखा झा के लिए महज बचपन का शौक हुआ करती थी। आज यही शौक उनकी पहचान और आत्मनिर्भरता का आधार बन चुका है। बिहार के मधुबनी जिले से मथुरा आईं शिखा ने अपनी पारंपरिक कला को न सिर्फ सहेजा, बल्कि उसे सोशल मीडिया के जरिये देश-दुनिया तक पहुंचा दिया। लक्ष्मीनगर निवासी शिखा झा मूलरूप से बिहार के मधुबनी जिले की रहने वाली हैं। मधुबनी पेंटिंग से उनका रिश्ता बचपन से है। घर-परिवार में इस कला का माहौल मिला तो रंगों और रेखाओं से दोस्ती होती चली गई। हालांकि पढ़ाई के लिए उन्होंने लाइब्रेरी साइंस को चुना। पढ़ाई पूरी करने के बाद निजी स्कूल में नौकरी शुरू कर दी। जिंदगी अपनी सामान्य रफ्तार से चल रही थी, लेकिन कोरोना की लहर ने सब कुछ बदल दिया। कोरोना काल में स्कूल बंद हुए तो नौकरी भी चली गई। अचानक खाली हुए समय में शिखा ने अपने पुराने शौक को फिर से हाथ में लिया। इंटरनेट की मदद से मधुबनी पेंटिंग की बारीकियों को समझा और घर पर ही चित्र बनाना शुरू कर दिया। शुरुआत में बनाए गए चित्रों को उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया। धीरे-धीरे लोगों की नजर उनके काम पर पड़ने लगी। पेंटिंग पसंद आई तो पूछताछ शुरू हुई और फिर ऑर्डर आने लगे। सोशल मीडिया उनके लिए ऐसा माध्यम बना, जिसने घर की चारदीवारी में बनाई जा रही कलाकृतियों को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा दिया। अब शिखा की बनाई मधुबनी पेंटिंग ऑनलाइन माध्यम से देश ही नहीं, विदेशों तक भी पहुंच रही हैं। शिखा पारंपरिक मधुबनी शैली में प्राकृतिक रंगों और बारीक डिजाइनों का इस्तेमाल करती हैं। उनकी कोशिश रहती है कि पारंपरिक कला की पहचान बनी रहे, लेकिन प्रस्तुति में नया आकर्षण भी दिखाई दे। यही वजह है कि उनकी पेंटिंग लोगों को पसंद आ रही हैं। वे वॉल प्लेट्स, ईयर रिंग, फ्रिज मेगनेट, बैग, पर्स पोस्टर, दुपट्टे और साड़ियों पर मधुबनी कला को उकेरा है, जो लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। शिखा कहती हैं कि कभी जिसे केवल शौक समझकर बनाया था, वही आज उनके जीवन का आधार बन गया है। अपने हुनर से कमाई करने और खुद के पैरों पर खड़े होने की खुशी उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह चाहती हैं कि मधुबनी की यह पारंपरिक कला नई पीढ़ी तक पहुंचे और अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ें।