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दमोह का दुर्गा दरबार: 1851 में स्थापित हुईं मां जगतजननी, साल में दो बार होते हैं मिट्टी की प्रतिमा के दर्शन

Sun, 18 Oct 2026 04:34 PM IST
दमोह ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दमोह

मध्य प्रदेश के दमोह जिला मुख्यालय पर मां जगतजननी का एक ऐसा प्राचीन दरबार है, जो अपनी अनूठी परंपरा, ऐतिहासिक मान्यताओं और मिट्टी से निर्मित मां दुर्गा की प्रतिमा के कारण विशेष पहचान रखता है। भारत दुर्गा देवालय के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में विराजमान माता रानी की प्रतिमा की स्थापना वर्ष 1851 में की गई थी। यानी यह दरबार 1857 की क्रांति से भी छह वर्ष पहले स्थापित हो चुका था। करीब 175 वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहां की धार्मिक परंपराएं उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही हैं।

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां विराजमान मां दुर्गा की प्रतिमा मिट्टी से निर्मित है। दस भुजाओं वाली मां दुर्गा की यह प्रतिमा राक्षस का संहार करती हुई दिखाई देती है। प्रतिमा के दोनों ओर मां की गणिकाएं भी विराजमान हैं। नवरात्र के दौरान यहां मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। भक्तों के बीच इस दरबार को लेकर गहरी आस्था है और लोग मां के समक्ष अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं।

पंडित हरप्रसाद भारत ने की थी मंदिर की स्थापना
भारत दुर्गा देवालय का इतिहास वर्ष 1851 से जुड़ा हुआ है। मंदिर की स्थापना पंडित हरप्रसाद भारत ने की थी। वर्तमान में उनकी ही पीढ़ी के पंडित शांतनु भारत गुरुजी मंदिर में पूजा-अर्चना और मां की सेवा की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह सेवा मंदिर की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर में नवरात्र के दौरान पुजारी परिवार के सदस्य दिन-रात मां की आराधना और धार्मिक व्यवस्थाओं में जुटे रहते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर को केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक धार्मिक धरोहर के रूप में भी पहचान दिलाई है।

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हटा में बनी थी प्रतिमा, बैलगाड़ी से दमोह लाई गईं मां
मंदिर में विराजमान माता रानी की प्रतिमा का निर्माण दमोह जिले के हटा में किया गया था। उस दौर में प्रतिमा को दमोह लाने के लिए बैलगाड़ी का सहारा लिया गया था। आज के आधुनिक परिवहन साधनों से अलग, उस समय प्रतिमा को हटा से दमोह तक लाना अपने आप में एक विशेष व्यवस्था रही होगी। मिट्टी से बनी इस प्रतिमा की विशिष्टता आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। दस भुजाओं वाली मां दुर्गा का स्वरूप शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। प्रतिमा में मां को राक्षस का संहार करते हुए दर्शाया गया है। प्रतिमा के दोनों ओर विराजमान गणिकाएं इसके स्वरूप को और विशिष्ट बनाती हैं।

साल में केवल दो बार खुलते हैं मंदिर के पट
भारत दुर्गा देवालय की एक और विशेष परंपरा है, जिसके कारण यह मंदिर अन्य मंदिरों से अलग पहचान रखता है। यहां सालभर नियमित रूप से श्रद्धालुओं के लिए पट खुले रहने के बजाय मुख्य दर्शन चैत्र और क्वार के नवरात्र के दौरान ही होते हैं। यानी वर्ष में दो बार नवरात्र के अवसर पर भक्तों को मां जगतजननी के दर्शन का अवसर मिलता है। नवरात्र के इन दिनों में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ दूसरे क्षेत्रों से आने वाले भक्तों की भी यहां आस्था जुड़ी हुई है। सीमित अवधि में दर्शन की यह परंपरा मंदिर के धार्मिक महत्व को और खास बनाती है।

दशहरे पर निकलती थी मां की प्रतिमा, फिर मंदिर में ही विराजमान रखने की परंपरा
मंदिर से जुड़ी पुरानी परंपरा के अनुसार, वर्ष 1851 में प्रतिमा की स्थापना के बाद दशहरे के अवसर पर माता रानी की प्रतिमा को शहर में भ्रमण के लिए निकाला जाता था। उस समय यह आयोजन धार्मिक आस्था और परंपरा का हिस्सा था। हालांकि, आगे चलकर इस परंपरा में बदलाव आया और मां की प्रतिमा को मंदिर में ही विराजमान रखने की परंपरा शुरू हो गई। मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1944 में दमोह में गौहत्या के विरोध में द्वारका प्रसाद श्रीवास्तव के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था। इसी दौरान दशहरा चल समारोह के बीच अंग्रेज अधिकारियों ने जुलूस को रोक दिया था। बताया जाता है कि इसके बाद मां की प्रतिमा करीब 22 दिनों तक पुराने थाने में रखी रही। इस अवधि में भी प्रतिमा की पूजा-अर्चना जारी रही।

पुजारी की प्रार्थना और जुलूस आगे बढ़ाने के आदेश की कहानी
मंदिर से जुड़ी प्रचलित मान्यता के अनुसार, जब मां की प्रतिमा पुराने थाने में रखी हुई थी, तब पुजारी ने मां से प्रार्थना की कि अब यह प्रतिबंध हट जाए और आगे से प्रतिमा को मंदिर से बाहर नहीं निकाला जाएगा। कथा के अनुसार, इसी दौरान अंग्रेज अधिकारियों की ओर से रुके हुए जुलूस को आगे बढ़ाने के आदेश जारी कर दिए गए। श्रद्धालु इस घटनाक्रम को मां की कृपा और आस्था से जोड़कर देखते हैं। इसके बाद प्रतिमा को मंदिर में ही स्थापित रखने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, इस घटनाक्रम और इसके कारणों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध विवरण में नहीं है, इसलिए इसे मंदिर से जुड़ी प्रचलित मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पीढ़ी दर पीढ़ी की सेवा से आज भी जीवंत है ऐतिहासिक दरबार
करीब 175 वर्ष से अधिक पुराने इस मंदिर की खासियत इसकी प्राचीन प्रतिमा के साथ-साथ पूजा-अर्चना की निरंतरता भी है। पंडित हरप्रसाद भारत से शुरू हुई सेवा परंपरा को उनकी पीढ़ी के पुजारी पंडित शांतनु भारत गुरुजी आगे बढ़ा रहे हैं। नवरात्र के दिनों में परिवार के सदस्य मां की सेवा में जुटे रहते हैं और श्रद्धालुओं को दर्शन का अवसर मिलता है।

दमोह के भारत दुर्गा देवालय में मिट्टी से बनी मां दुर्गा की प्रतिमा, वर्ष में दो बार खुलने वाले मंदिर के पट और दशहरे से जुड़ी पुरानी मान्यताएं इसे जिले के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं। आधुनिक समय में भी यहां की परंपराओं का कायम रहना इस दरबार के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और ऐतिहासिक विरासत की अहमियत को दर्शाता है। दुर्गा देवालय    दुर्गा देवालय में स्थापित मिट्टी से बनी दुर्गा प्रतिमा   दुर्गा देवालय में स्थापित मिट्टी से बनी दुर्गा प्रतिमा

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