चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर वीरवार को प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता श्री चिंतपूर्णी मंदिर में दुर्गा अष्टमी का पर्व श्रद्धा, आस्था और भक्ति भाव के साथ धूमधाम से मनाया गया। मेले के आठवें दिन तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें मंदिर परिसर में लगनी शुरू हो गईं। 'जय माता दी' के जयघोष से पूरा मंदिर क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया।इस पावन अवसर पर प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए माता के गर्भगृह में नारियल की बलि दी गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार दुर्गा अष्टमी के दिन माता के चरणों में नारियल अर्पित करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इसके साथ ही मंदिर परिसर में विधिवत मंत्रोच्चार के बीच भव्य हवन का आयोजन किया गया, जिसमें आहुतियां डालकर विश्व कल्याण और सुख-समृद्धि की कामना की गई। हवन के समापन पर पूर्णाहुति डाली गई और श्रद्धालुओं ने माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त किया।अष्टमी के पावन अवसर पर माता चिंतपूर्णी को 56 प्रकार के व्यंजनों (छप्पन भोग) का विशेष भोग अर्पित किया गया। इनमें विभिन्न प्रकार की मिठाइयां, फल और मेवे शामिल थे। माता के दरबार को देश-विदेश से आए ताजे फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया, जिससे मंदिर की शोभा और भी बढ़ गई। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने साथ चुनरी, नारियल और प्रसाद लेकर माता के दर्शन के लिए पहुंचे, जबकि कई भक्त पैदल यात्रा कर तथा कनक-दंडवत करते हुए माता के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचे।मंदिर प्रशासन की ओर से अष्टमी के दिन श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। वहीं क्षेत्र में कन्या पूजन का भी विशेष महत्व देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने छोटी कन्याओं को साक्षात देवी का स्वरूप मानकर उनके चरण पखारे, उन्हें हलवा-पूरी का प्रसाद खिलाया और दक्षिणा भेंट की। भक्तों का अटूट विश्वास है कि दुर्गा अष्टमी के दिन माता चिंतपूर्णी के दरबार में सच्चे मन से माथा टेकने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।