यह दिल एक खंडहर
जिसकी जीर्ण दीवारों से
निकलती करुण पुकार
पर उसे सुनने मत आओ !
खंडहर के मध्य एक अंधकूप
जिसके अलौकिक गर्भ में
अविस्मरणीय अतीत की परछाइयां
पर उसे झांकने मत आओ !
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खंडहर में वेगवान चिर परिचित समीर
जिसके शीतल मृदु झोंके -जैसे
भयभीत करती आहट किसी की
पर उसे थाहने मत आओ !
खंडहर के मुरझाए वृक्ष
जिनकी शाखाओं पर
खुदी कुछ स्पर्शी स्मृतियाँ
पर उन्हें खुरचने मत आओ !
शनैः शनैः-
यह खंडहर स्वतः ढंक जाएगा
कूप, समीर, वृक्ष - दब जाएंगे
सब के सब
कालचक्र के बोझ तले !
- सरिता स्निग्ध ज्योत्स्ना की फेसबुक वाल से साभार