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Social Media Poetry: तलाश कर के नए ज़ाविए मोहब्बत के

काव्य डेस्क

Viral Kavya
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                                                  लगा हूँ बोलने तो बड़बड़ा रहा हूँ मैं
ख़ामोश रहने की क़ीमत चुका रहा हूँ मैं

हर एक शख़्स तेरा रिश्तेदार लगता है
हर एक शख़्स को ख़ातिर में ला रहा हूँ मैं

तलाश कर के नए ज़ाविए मोहब्बत के
कई दिलों को धड़कना सिखा रहा हूँ मैं

ज़रूरतन कभी क़ीमत गिराई थी अपनी
नतीजतन अब अज़ीयत उठा रहा हूँ मैं

दरअसल अपने गिरेबां का पास है मुझ को
यह हर किसी से जो दामन बचा रहा हूँ मैं

मैं रख रहा हूँ बहरहाल अपने नाम की लाज
शिकस्ता दिल हूँ मगर मुस्कुरा रहा हूँ मैं

साभार इस्माईल राज़ की फेसबुक वॉल से
2 वर्ष पहले
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RATAN KUMAR

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