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अत्बाफ़ अबरक: राब्ते भी रखता हूँ रास्ते भी रखता हूँ

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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राब्ते भी रखता हूँ रास्ते भी रखता हूँ
हर किसी से मिलता हूँ फ़ासले भी रखता हूँ

ग़म कहाँ मनाता हूँ छोड़ जाने वालों का
तोड़ कर त'अल्लुक़ मैं दर खुले भी रखता हूँ

मौसमों की गर्दिश से मैं निकल तो आया हूँ
याद पर ख़िज़ाओं के हादसे भी रखता हूँ

वक़्त के मुताबिक़ अब ख़ुद को है अगर बदला
वक़्त को बदलने के हौसले भी रखता हूँ

भर के एक दिन घाव सारे भूल जाते हैं
ज़ख़्म सो पुराने कुछ अन-सिले भी रखता हूँ

गो किसी भी मंज़िल की अब नहीं तलब मुझ को
हर घड़ी मैं पैरों में आबले भी रखता हूँ

मानता हूँ 'अब्रक' मैं बात यार लोगों की
सोच के मगर अपने ज़ाविए भी रखता हूँ
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7 घंटे पहले
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