देखने वाले मिरी ख़ामोशी-ए-लब को न देख
आँखों आँखों में फ़साना कह दिया करता हूँ मैं
ग़म है कि एक तल्ख़ हक़ीक़त है आज-कल
दिल है कि सोगवार-ए-मोहब्बत है आज-कल
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हाए इस मजबूरी-ए-ज़ौक़-ए-नज़र को क्या करूँ
वो मुझे देखें न देखें मैं उन्हें देखा करूँ
दिल नज़र बन जाएगा ग़म हर ख़ुशी हो जाएगी
आप के जाते ही दुनिया दूसरी हो जाएगी
निगाह की बंदिशें सलामत जुनूँ की पाबंदियाँ मुसल्लम
कहीं भरम खुल गया तो ऐ दिल मैं क्या करूँगा वो क्या करेंगे
जैसे किसी ने छीन ली रंगीनी-ए-बहार
क्या जानिए बहार में क्या याद आ गया
नग़्मा-ए-इश्क़ सुनाता हूँ मैं इस शान के साथ
रक़्स करता है ज़माना मिरे विज्दान के साथ
मैं तो इस आलम को क्या से क्या बना देता मगर
किस की चलती है हयात-ए-मुख़्तसर के सामने
छुप कर निगाह-ए-शौक़ से दिल में पनाह ली
दिल में न छुप सके तो रग-ए-जाँ में आ गए
दिल में किसी ख़लिश का गुज़र चाहता हूँ मैं
जैसी भी हो बस एक नज़र चाहता हूँ मैं
जो आसानियों को भी मुश्किल बना दें
वो क्या मेरी मुश्किल को आसाँ करेंगे
जब तू नहीं तो कुछ भी नहीं है बहार में
जी चाहता है मुँह भी न देखूँ बहार का
रहा गर्दिशों में हर-दम मिरे इश्क़ का सितारा
कभी डगमगाई कश्ती कभी खो गया किनारा
भरी दुनिया में आख़िर दिल को समझाने कहाँ जाएँ
मोहब्बत हो गई जिन को वो दीवाने कहाँ जाएँ