विज्ञापन

Urdu Poetry: रात का पिछ्ला पहर मुझ को बशारत दे गया

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            उस को देखा था फ़क़त दो-चार लम्हों के लिए
        
                                                    
                            
हो गए तन्हा जहाँ में कितनी सदियों के लिए

रात का पिछ्ला पहर मुझ को बशारत दे गया
आ रही है रौशनी तारीक गलियों के लिए

कोई सी रुत हो सदा पाया है उन को सोगवार
मौसमों का क़हर है मा'सूम पत्तों के लिए

अब कोई चेहरा कोई मंज़र हमें रोकेगा क्या
उठ चुके अपने क़दम पुर-पेच रस्तों के लिए

एक गुल है तुझ को प्यारा एक गुल मुझ को अज़ीज़
कितने पागल हो गए हम लोग रंगों के लिए

जिन का साया माओं की आग़ोश से कुछ कम न था
क़त्ल के अहकाम हैं अब उन दरख़्तों के लिए

अब नए पहलू से देखा चाहिए बाहर का रंग
मुंतख़ब कीजे नई जगहें दरीचों के लिए

ज़ात के तारीक ग़ारों में दरीचे खोलिए
रास्ता कोई तो हो सूरज की किरनों के लिए

कीजिए 'बेताब' रौशन अपनी पलकों पर दिए
रौशनी दरकार है बे-नूर कमरों के लिए

~ सलीम बेताब

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।


लिंक पर क्लिक करें और जुड़ें अमर उजाला काव्य के व्हाट्सएप चैनल से 

https://whatsapp.com/channel/0029VaXoA27A89Mp96alfc2o 

4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pankaj Sharma

1295 कविताएं

View Profile

User

66 कविताएं

View Profile

Yunush khan

8134 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10459 कविताएं

View Profile