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Kaleem Aajiz: कलीम आजिज़ की ग़ज़ल 'जहाँ ग़म मिला उठाया फिर उसे ग़ज़ल में ढाला'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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जहाँ ग़म मिला उठाया फिर उसे ग़ज़ल में ढाला


यही दर्द-ए-सर ख़रीदा यही रोग हम ने पाला

तिरे हाथ से मिली है मुझे आँसुओं की माला
तिरी ज़ुल्फ़ हो दो-गूना तिरा हुस्न हो दो-बाला

ये समाँ उसे दिखाऊँ सबा जा उसे बुला ला
न बहार है न साक़ी न शराब है न प्याला

मिरे दर्द की हक़ीक़त कोई मेरे दिल से पूछे
ये चराग़ वो है जिस से मिरे घर में है उजाला

उसे अंजुमन मुबारक मुझे फ़िक्र-ओ-फ़न मुबारक
यही मेरा तख़्त-ए-ज़र्रीं यहीं मेरी मिर्ग-छाला
4 वर्ष पहले
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