विज्ञापन

जौन एलिया: हम तिरी दास्ताँ के थे ही नहीं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


हम तो जैसे वहाँ के थे ही नहीं
बे-अमाँ थे अमाँ के थे ही नहीं

हम कि हैं तेरी दास्ताँ यकसर
हम तिरी दास्ताँ के थे ही नहीं

उन को आँधी में ही बिखरना था
बाल ओ पर आशियाँ के थे ही नहीं

अब हमारा मकान किस का है
हम तो अपने मकाँ के थे ही नहीं

हो तिरी ख़ाक-ए-आस्ताँ पे सलाम
हम तिरे आस्ताँ के थे ही नहीं

हम ने रंजिश में ये नहीं सोचा
कुछ सुख़न तो ज़बाँ के थे ही नहीं

दिल ने डाला था दरमियाँ जिन को
लोग वो दरमियाँ के थे ही नहीं

उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं 
 
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
8 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all