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जाँ निसार अख़्तर: दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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दिल को हर लम्हा बचाते रहे जज़्बात से हम
इतने मजबूर रहे हैं कभी हालात से हम

नश्शा-ए-मय से कहीं प्यास बुझी है दिल की
तिश्नगी और बढ़ा लाए ख़राजात से हम

आज तो मिल के भी जैसे न मिले हों तुझ से
चौंक उठते थे कभी तेरी मुलाक़ात से हम

इश्क़ में आज भी है नीम-निगाही का चलन
प्यार करते हैं उसी हुस्न-ए-रिवायात से हम

मर्कज़-ए-दीदा-ए-ख़ुबान-ए-जहाँ हैं भी तो क्या
एक निस्बत भी तो रखते हैं तिरी ज़ात से हम
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2 महीने पहले
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