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गुलशन मदान: हम को सच कहने की क़ीमत मिल गई

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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हम को सच कहने की क़ीमत मिल गई
कुछ न कहने की नसीहत मिल गई

मुद्दतों के बा'द आया ख़त तिरा
यूँ लगा जैसे रियासत मिल गई

मिल गया ईमान-दारी का हुनर
बस बुज़ुर्गों की विरासत मिल गई

वो सिकंदर भी तो ख़ाली ही गया
क्या हुआ जो तुम को दौलत मिल गई

आप मुझ से राह में क्या मिल गए
शहर भर को इक शरारत मिल गई

और क्या जीने को 'गुलशन' चाहिए
थोड़ा ग़म थोड़ी मोहब्बत मिल गई
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एक महीने पहले
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Aditya Mishra

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