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अहमद मुश्ताक़: तिरा वुजूद ही सब से बड़ी हक़ीक़त है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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तिरा वुजूद ही सब से बड़ी हक़ीक़त है
तुझे भुला नहीं सकता यही मोहब्बत है

गिला नहीं है तिरी बे-त'अल्लुक़ी से मुझे
मैं जानता हूँ तुझे भूलने की 'आदत है

दिल-ए-हज़ीं को बड़ी देर में हुआ मा'लूम
यही कि तेरी मोहब्बत मिरी ज़रूरत है

मिरी तलब में है ठंडक गए ज़मानों की
तिरे लहू में नए मौसमों की हिद्दत है

ख़ुद अपनी ज़ात का जब तज्ज़िया किया तो खुला
तिरे बग़ैर भी जीने की एक सूरत है
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10 घंटे पहले
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