धूप
बदली की घटाओं को चीर कर
हम तुम्हारे लिए धूप लेकर आये हैं
बुजुर्गों ने जो बीजी थी , विरासत की
हम ख़ालिस धूप लेकर आये हैं
मायूसियों की रेत में दब गई, फिर
तराश कर हम वही धूप लेकर आये हैं
जो ता उम्र खिले हल्की पीली गुलाबी,
हम इश्क़ की वो ख़ुशनुमा धूप लेकर आयें हैं
था वैसे अंधेरों का बंदोबस्त, मगर
हम हौंसलों की धूप लेकर आये हैं
अहले चमन को जो फिर गुलिस्ताँ कर दे
हाँ, हम नेकी की वही धूप लेकर आये हैं
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जिस से करनी थी तौबा,
वो ही खुद ब खुद ख़ुदा बन गया,
मेरे मज़हब में, मुहब्बत को
किसी भी सूरत कुफ़्र नहीं मानते,
वे अँधेरें बेचते रहे
हमने रोशनी दी, बेमोल,
जैसे को तैसा,
हमारे यहाँ नेकदिली नहीं मानते,
जब कायनात ही सारी तोहफ़ा है,
फिर होड़ किससे ? कम भी काफ़ी है,
खुद को हम हर
ख़ुशी का हक़दार नहीं मानते,
झूठ और मक्कारी के पायदान चढ़ के ,
बुलंदियाँ जो पाए, ऐसे बन्दे को
मेरे जहाँ में
कोई सिकन्दर नहीं मानते,
मुश्किलों में मायने मिलते हैं - अपने,
और हक़ीकत दोनों के, किनारों पे
खेलने को हम
मुलाकात - ए - ज़िन्दगी नहीं मानते,
वो शायर मेरी रूह पर जो
लिख रहा है, वही शब्द है,
बाकी किसी नज़्म को हम
शायरी नहीं मानते