कम लफ़्ज़ों में ज्यादा बातें कह पाने का एक मुकम्मल तरीका है शायरी। शायरी वो काम है जिसमें भीतर छुपी कोई बात, जज़्बात, ख़यालात या एह्सास को बिना किसी बंदिश के शब्दों के साथ पिरोया जाता है और इसी शायरी से वो सब कहा जा सकता है जिसे अक्सर घंटों की गई बातों में, कई दिनों की मुलाकातों में भी कही नहीं जा सकता होगा। एक मुकम्मल शेर हमारे पूरे दिन की थकान मिटा सकता है और एक ग़ज़ल किसी किरदार की कहानी बयां कर सकता है।
शायरी को इसी ख़ूबसूरती के साथ पेश करते हैं शारिक़ कैफ़ी। उनकी शायरी जहां आज के उन्मादी वक़्त के अलग-अलग वैचारिक पड़ाव से निकली परेशानियों को घेरती है और उनका मखौल उड़ाती है, वहीं दूसरी तरफ इंसानी जीवन की मुश्किलों से भी रूबरू कराती है। शायर शारिक़ कैफ़ी मौजूदा वक़्त की ऐसी आवाज़ हैं जिनकी शायरी में लोगों का शोक झलकता है, एक गहरी चुप्पी जो सवालों के जवाब खोज़ती हो और तर्क व बहस करते आम आदमी, जिनकी आवाज़ों को अनसुना कर दिया जाता है।
पेश है उनकी कुछ ग़ज़ल -
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ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है
हमें इक दूसरा अच्छा लगा है
समझना है उसे नज़दीक जा कर
जिसे मुझ सा बुरा अच्छा लगा है
ये क्या हर वक़्त जीने की दुआएँ
यहाँ ऐसा भी क्या अच्छा लगा है
सफ़र तो ज़िंदगी भर का है लेकिन
ये वक़्फ़ा सा ज़रा अच्छा लगा है
मिरी नज़रें भी हैं अब आसमाँ पर
कोई महव-ए-दुआ अच्छा लगा है
हुए बरबाद जिस के इश्क़ में हम
वो अब जा कर ज़रा अच्छा लगा है
वो सूरज जो मिरा दुश्मन था दिन भर
मुझे ढलता हुआ अच्छा लगा है
कोई पूछे तो क्या बतलाएँगे हम
कि इस मंज़र में क्या अच्छा लगा है
हैं अब इस फ़िक्र में डूबे हुए हम
उसे कैसे लगे रोते हुए हम
कोई देखे न देखे सालहा-साल
हिफ़ाज़त से मगर रक्खे हुए हम
न जाने कौन सी दुनिया में गुम हैं
किसी बीमार की सुनते हुए हम
रहे जिस की मसीहाई में अब तक
उसी के चारागर होते हुए हम
गिराँ थी साए की मौजूदगी भी
अब अपने आप से सहमे हुए हम
कहाँ हैं ख़्वाब में देखे जज़ीरे
निकल आए किधर बहते हुए हम
बढ़ीं नज़दीकियाँ इस दर्जा ख़ुद से
कि अब उस का बदल होते हुए हम
रखें क्यूँकर हिसाब एक एक पल का
बला से रोज़ कम होते हुए हम
बहुत हिम्मत का है ये काम 'शारिक़'
कि शरमाते नहीं डरते हुए हम
साभार - रेख़्ता