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आज का शब्द: झाँसा और अष्टभुजा शुक्ल की कविता- और नहीं अब सहने वाली

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- झाँसा, जिसका अर्थ है- बहकाने की चाल, धोखा। प्रस्तुत है अष्टभुजा शुक्ल की कविता- और नहीं अब सहने वाली

और नहीं अब सहने वाली
हमसे जन्मा पुरुषवर्ग हमको ही देता गाली
हर नातों की मूल हमी हैं, हम ही कोठे वाली
हम चौके में, हम बिस्तर में, हम पत्तल, हम थाली
अंतःपुर से झुग्गी तक बन करके नदी बहीं हम
जोरन जहाँ खोंच भर पाईं जमकर बनीं दही हम
सूर्य न देखीं, घाम न जानीं, गाली लात सहीं हम
हमसे जो कुछ कहा पुरुष ने, अब तक वही कहीं हम
प्रीति-रीति का झाँसा देकर पहले हमें फँसाते
फिर पंछी जैसे पिंजड़े में, हम बंदी बन जाते
हम माया तो वे मायावी, कौन दूध का धोया
उनका अपना बचा हुआ सब, हमने सब कुछ खोया
मंच उन्हें, नेपथ्य हमें, यह नाटक नहीं चलेगा
इस अभिनय के मूकदर्शकों! सबका दुर्ग जलेगा
पहले हटें विदूषक इसमें से फिर बात करेंगे
अष्टभुजा तर्जनी दिखाने से अब नहीं डरेंगे।

3 वर्ष पहले
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