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आज का शब्द : गिरिराज और गोपालप्रसाद व्यास की कविता भारत में गिरि बहुत हैं, ब्रज में श्री गिरिराज

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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हिंदी हैं हम शब्द-श्रृंखला में आज का शब्द है गिरिराज जिसका अर्थ है - 1. पर्वतों का राजा 2. ब्रजभूमि में स्थित गोवर्धन पर्वत को भी गिरिराज कहा जाता है। कवि गोपासप्रसाद व्यास ने अपनी कविता में इस शब्द का प्रयोग किया है। 



जगती में नग बहुत हैं, भारत में नगराज
भारत में गिरि बहुत हैं, ब्रज में श्री गिरिराज।
भक्ति मुक्ति अनुरक्ति सब, देवत छप्पर फाड़
पाथर पूजन जात क्यौं, कबिरा पूज पहाड़।
पूजित सुंदर श्याम कौं, ब्रज-रक्षक ब्रज-बाड़
सात कोस कौ देवता, मत कहु याहि पहाड़।
लीला-रस में सम्मिलित, दर्शनीय गिरिराज
ब्रज की परम विभूति हैं, गोवर्धन महाराज।

ब्रज-बसुधा के बीच बिराजत गिरि गोवर्धन
श्याम-सुचिक्कन शिला तरु-लता सघन सुहावन।
चहुँदिसि सरवर-ताल अनेकन वन अरु उपवन
वापी-कूप-तड़ाग अमिय जल पिबत भक्तजन।
मध्य मानसी गंग घाट छतरी अति सुंदर
संत जपत हरि-नाम बैठ गिरि कंदर अंदर।
चन्द्र सरोवर जँह कियो सूरदास नैं बास
यहै परम रासस्थली जन्म लियौ कवि 'व्यास'।
जयति गोवर्धनधर प्रभु।

रावन के दादा पुलस्त्य ऋषि ब्रज में लाए
जब काशी लै चले, जमे नहिं उठे उठाए।
तिल-तिल कर नित घटूँ मतौ गिरिराज उचारौ
कलजुग आवै घोर, लोप है जाय हमारौ।
कृष्ण उठाए उठे, इन्द्र कौ मान मिटायौ
श्याम-रूप ह्वै पुजे, जौन माँग्यौ फल पायौ।
सात कोस की परिक्रमा चढ़त दूध और फूल
लोट-लोट सिर धरत हैं भावुक ब्रज की धूल।
जयति गोवर्धनधर प्रभु।

सुर पूजैं नखत लै, नर पूजैं आखत लै,
मुनि गंधर्व पूजैं, ताल-सुर बाजैं लै।
मगन महेस पूजैं, गगन सुरेस पूजैं,
पगन गनेस पूजैं, रिद्धि-सिद्धि साजैं लै।
सारद सुजान पूजैं, नारद महान पूजैं,
सकल जहान पूजैं, गान-गुन गाजैं लै।
गोपी-गोप-गाय पूजैं, 'व्यास' कवि धाय पूजैं,
बाबा नंदराय पूजैं, गोद ब्रजराजैं लै।

जय बिनु रूखन की पुहुप चढ़ावैं नित,
जय बिनु नालन की चरन पखारैं जो।
जय बिनु गायन की घंटिका बजावैं मंजु,
जय चाँद-तारन की आरती उतारैं जो।
जय बिनु मोरन की नाचैं घनस्याम पेखि,
जय घनस्यामन की पारत फुहारैं जो।
जय उन गोपिन की गावैं, गिरधारी-गान,
जय गिरिधारन की गिरिधर धारैं जो।
4 वर्ष पहले
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